बॉलीवुड में करियर एक रात में बनते हैं और एक पल में मिट जाते हैं। रिश्ते, वादे, और सपने – सब कुछ कैमरे के पीछे टूटते और जुड़ते रहते हैं। पर 80 के दशक में एक ऐसी कहानी घटी जिसने हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिभाशाली संगीतकारों में से एक आर.डी. बर्मन को अंदर तक तोड़ दिया।
यह कहानी है विश्वासघात, टूटे सपनों और देर से मिली जीत की।
एक वादा… जो निभाया नहीं गया
आर.डी. बर्मन, जिनकी धुनों पर एक पूरा युग थिरकता था, 80 के दशक तक गुमनामी के अंधेरे में जा रहे थे। उनका करियर ढलान पर था। ऐसे में फिल्ममेकर सुभाष घई ने उन्हें उम्मीद की एक किरण दी – “राम लखन” और “देवा” नाम की दो बड़ी फिल्में।
इंडस्ट्री के अंदरूनी सूत्र कहते हैं, “वो आख़िरी उम्मीद थी बर्मन साहब के लिए। वो बहुत कम प्रोजेक्ट्स कर रहे थे, और सुभाष घई का नाम तब बहुत बड़ा था।”
पर एक चुपचाप फैसला सब कुछ बदल गया।
संगीत बदल गया, किस्मत भी
बिना किसी को बताए, सुभाष घई ने “राम लखन” का संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को दे दिया। और “देवा” के लिए अमिताभ बच्चन को साइन किया गया। लेकिन जल्द ही घई और अमिताभ के बीच अनबन हो गई और “देवा” की शूटिंग शुरू होने से पहले ही फिल्म ठंडे बस्ते में चली गई।
बर्मन साहब के लिए यह सिर्फ एक काम का नुकसान नहीं था — यह विश्वासघात था।
“वो टूट चुके थे। वो कह रहे थे – अब कोई उम्मीद नहीं बची,” एक पुराने सहयोगी ने बाद में याद किया।
क्या उन्होंने हार मान ली थी?
हां, लगभग। आर.डी. बर्मन ने म्यूजिक देना लगभग छोड़ ही दिया था।
उसी दौर में निर्देशक विदु विनोद चोपड़ा ने उन्हें अपनी फिल्म “1942: अ लव स्टोरी” के लिए संपर्क किया। लेकिन बर्मन ने पहले मना कर दिया।
“वो कहना चाहते थे – मैं अब कुछ नहीं कर सकता। उन्हें मनाने में बहुत वक्त लगा,” विदु विनोद चोपड़ा ने एक इंटरव्यू में बताया था।
जब धुनों ने आंसू पोछे
आखिरकार, उन्होंने हां कहा – और जो एल्बम बना, वो इतिहास में दर्ज हो गया।
“एक लड़की को देखा”, “कुछ ना कहो”, “प्यार हुआ चुपके से” – हर गाना आत्मा को छू जाता है।
यह एल्बम बर्मन का अंतिम संगीत था। और जब फिल्म रिलीज़ हुई, तो संगीत ने हर दिल जीत लिया। कई अवॉर्ड मिले, खूब सराहना मिली – लेकिन तब तक पंचम दा हमारे बीच नहीं रहे।
एक अधूरी जीत, जो दिल को भर देती है
आर.डी. बर्मन को वो सच्चा सम्मान बहुत देर से मिला – उनके जाने के बाद।
यह कहानी सिर्फ एक संगीतकार की नहीं, हर उस कलाकार की है जिसे कभी दुनिया ने भुला दिया हो, पर जिसने हार नहीं मानी।
आज जब भी ‘एक लड़की को देखा’ बजता है, वो सिर्फ एक रोमांटिक गाना नहीं, एक टूटी आत्मा की आखिरी पुकार है… जो आज भी धुन बनकर जी रही है।
पंचम दा, आपकी धुनें आज भी हर टूटे दिल को जोड़ती हैं। धन्यवाद।